पश्चिम एशिया में इस समय जो कुछ भी हो रहा है, उसने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं। ईरान ने कुवैत पर बड़ा मिसाइल और ड्रोन हमला करके साफ कर दिया है कि अब वह केवल बड़ी ताकतों से परदे के पीछे से नहीं लड़ेगा। यह हमला सीधे तौर पर कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ध्यान में रखकर किया गया। अमेरिकी हवाई हमलों का जवाब देने के लिए ईरान ने जिस तरह खाड़ी के शांत देशों को निशाना बनाना शुरू किया है, उसने इस पूरे क्षेत्र को एक खतरनाक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
इस हमले की गंभीरता को सिर्फ एक सामान्य सैन्य झड़प मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। दरअसल, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने इस पूरी कार्रवाई की जिम्मेदारी ली है। उनका दावा है कि यह हमला अमेरिका की उन गतिविधियों के जवाब में था जो ईरान के खिलाफ चलाई जा रही हैं। लेकिन इसका सबसे ज्यादा नुकसान कुवैत को उठाना पड़ा है। कुवैत के अली अल सलीम एयरबेस और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास जो तबाही देखी गई, उसने साफ कर दिया है कि इस जंग की आंच अब उन देशों तक पहुंच चुकी है जो अब तक खुद को सुरक्षित मान रहे थे।
कुवैत पर हुआ हमला और जमीनी हकीकत
ईरान की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोनों ने कुवैत के संवेदनशील इलाकों को निशाना बनाया। कुवैती वायु रक्षा प्रणाली (एयर डिफेंस सिस्टम) ने मुस्तैदी दिखाते हुए कई मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया। इसके बावजूद, कुछ मिसाइलें और ड्रोन अपने टारगेट के करीब गिरने में कामयाब रहे।
कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल भवन (टी1) को इस हमले में भारी नुकसान पहुंचा है। धमाके इतने जोरदार थे कि आसपास के इलाकों में हड़कंप मच गया। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, इस हमले में कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और बुनियादी ढांचे को तगड़ी चोट पहुंची है। उड़ानों को तुरंत रोकना पड़ा और पूरे एयरस्पेस को एहतियातन बंद कर दिया गया। केवल कुवैत ही नहीं, बल्कि बहरीन और कतर के ऊपर भी इसी तरह के हमलों की खबरें आईं, जिसके बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में सायरन गूंजने लगे।
ईरान ने इस हमले के पीछे तर्क दिया है कि अमेरिकी सेना ने उसके किश्म द्वीप (Qeshm Island) पर आत्मरक्षा के नाम पर जो बमबारी की थी, यह उसका सीधा बदला है। ईरान का मानना है कि कुवैत और बहरीन जैसे देश अमेरिकी सेना को अपने यहां पनाह देकर उसके खिलाफ हो रही कार्रवाइयों में हिस्सेदार बन रहे हैं।
अली अल सलीम एयरबेस ही ईरान का मुख्य निशाना क्यों बना
आपको समझना होगा कि ईरान ने कुवैत के आम ठिकानों के बजाय अली अल सलीम एयरबेस को ही क्यों चुना। इस एयरबेस का सामरिक महत्व बहुत बड़ा है। यहां कुवैती सेना के साथ-साथ अमेरिकी वायुसेना के जवान और उनके घातक विमान तैनात रहते हैं। यह बेस अमेरिका के लिए पूरे पश्चिम एशिया में लॉजिस्टिक सपोर्ट और निगरानी का एक बहुत बड़ा केंद्र है।
ईरान का सीधा गणित यह है कि अगर वह इन ठिकानों पर चोट करेगा, तो अमेरिका के लिए इस क्षेत्र में ऑपरेशन चलाना मुश्किल हो जाएगा। ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि जो भी खाड़ी देश अमेरिकी सेना को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत देगा, उसे ईरान की मिसाइलों का सामना करना पड़ेगा। कुवैत पर हुआ यह हमला उसी धमकी का एक कड़ा अमलीजामा है।
इस हमले ने कुवैत की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि कुवैत के पास अमेरिका निर्मित पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, जो मिसाइलों को रोकने में काफी हद तक कामयाब रहा, लेकिन ड्रोनों के झुंड (ड्रोन स्वार्म) को पूरी तरह से रोक पाना किसी भी डिफेंस सिस्टम के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
क्षेत्रीय संतुलन का बिगड़ना और खाड़ी देशों की चिंता
इस हमले के बाद पूरे अरब जगत में डर और गुस्से का माहौल है। सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है। सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि ईरान का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है और यह पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंधों के सिद्धांतों के खिलाफ है।
खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनका पूरा आर्थिक ढांचा तेल के निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर टिका है। अगर ईरान इसी तरह मिसाइलें दागता रहा और खाड़ी के एयरस्पेस को बंद करना पड़ा, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। बहरीन की राजधानी मनामा और कतर के दोहा में भी मिसाइल इंटरसेप्शन के बाद गिरने वाले मलबे से नागरिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा है, जिससे यह साफ है कि कोई भी देश अब इस दायरे से बाहर नहीं है।
इस पूरी स्थिति में सबसे पेचीदा भूमिका उन अमेरिकी सैनिकों की है जो इन देशों में तैनात हैं। अमेरिका के सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने स्थिति को संभालने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है।
क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट है
बहुत से विश्लेषक इसे एक सीमित संघर्ष के रूप में देख रहे हैं, लेकिन अगर बारीक नजर से देखा जाए तो स्थिति इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। एक तरफ अमेरिका ईरान की तेल रिफाइनरियों और सैन्य ठिकानों को लगातार निशाना बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम के दम पर पूरे खाड़ी क्षेत्र को बंधक बनाने की कोशिश कर रहा है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी एक बड़ा फैक्टर है। अमेरिका की प्राथमिकता हमेशा से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की रही है। लेकिन इस तरह के सीधे सैन्य टकरावों के बाद ईरान के भीतर भी यह मांग तेज हो रही है कि उन्हें अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए परमाणु क्षमता हासिल कर लेनी चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो पूरा पश्चिम एशिया एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा जहां एक छोटी सी चिंगारी भी महाविनाश का कारण बन सकती है।
कुवैत जैसे छोटे और समृद्ध देश के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा नुकसानदेह है। वे न तो अमेरिका को पूरी तरह से अपने यहां से जाने के लिए कह सकते हैं और न ही ईरान के इन हमलों को लगातार झेल सकते हैं। यह एक ऐसी कूटनीतिक और सैन्य दुविधा है जिसका कोई आसान समाधान फिलहाल नजर नहीं आता।
कुवैत संकट से निपटने के व्यावहारिक कदम
इस तनावपूर्ण माहौल में आगे का रास्ता बेहद कठिन है। अगर इस संघर्ष को और बढ़ने से रोकना है, तो कुछ बेहद जरूरी और कड़े कदम उठाने ही होंगे।
- खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों को एकजुट होकर एक साझा सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार करना होगा, जो केवल अमेरिकी मदद पर निर्भर न हो।
- कुवैत और बहरीन जैसे देशों को अपने हवाई रक्षा तंत्र को और आधुनिक बनाना होगा, विशेषकर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले सुसाइड ड्रोनों से निपटने के लिए नई तकनीकों को शामिल करना जरूरी है।
- अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाना होगा ताकि वह नागरिक ठिकानों और तीसरे देशों को निशाना बनाना बंद करे।
- ऊर्जा और बिजली संयंत्रों जैसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्तियों के आसपास सुरक्षा घेरे को दोगुना करना होगा, क्योंकि हालिया हमलों में कुवैत के पावर और वाटर डिस्टिलेशन प्लांट्स को भी निशाना बनाने की कोशिश की गई है।
पश्चिम एशिया का यह संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं रहने वाला। इसका असर हर उस व्यक्ति पर पड़ेगा जो वैश्विक स्थिरता और शांति की उम्मीद करता है। आने वाले दिन इस क्षेत्र की नई इबारत लिखेंगे कि क्या बातचीत का रास्ता चुना जाता है या फिर गोलियों और मिसाइलों की आवाजें इस पूरे इलाके की किस्मत का फैसला करेंगी।