ईरान और अमेरिका की स्विट्जरलैंड वार्ता का वो अंदरूनी सच जो सामने नहीं आया

ईरान और अमेरिका की स्विट्जरलैंड वार्ता का वो अंदरूनी सच जो सामने नहीं आया

पश्चिम एशिया में चल रहे भयंकर तनाव के बीच स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट से एक ऐसी खबर आई जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। आधी रात के बाद करीब तीन बजे जब दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत की मेज से उठे, तो दुनिया भर के राजनयिकों ने राहत की सांस ली। ईरान और अमेरिका के बीच स्विट्जरलैंड में चल रहे पहले दौर की हाई-लेवल बातचीत आखिरकार खत्म हो गई है। इस बातचीत की सबसे बड़ी बात यह रही कि मध्यस्थता कर रहे दो देशों यानी कतर और पाकिस्तान ने एक साझा बयान जारी किया है। इस जॉइंट स्टेटमेंट में दावा किया गया है कि बातचीत बेहद सकारात्मक माहौल में हुई और दोनों पक्षों के बीच कई गंभीर मुद्दों पर सहमति बनी है।

अगर आपको लगता है कि यह महज एक सामान्य कूटनीतिक बैठक थी, तो आप गलत हैं। पर्दे के पीछे की कहानी बहुत अलग और पेचीदा है। एक तरफ वाशिंगटन में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को धमकियां दे रहे थे। दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड की वादियों में उनके अपने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ के साथ सीधी बातचीत कर रहे थे। इस बातचीत का सीधा असर आपकी जेब, वैश्विक तेल की कीमतों और दुनिया की शांति पर पड़ने वाला है।

क्या है कतर और पाकिस्तान का वह साझा बयान

कतर और पाकिस्तान ने सोमवार की सुबह जो साझा बयान जारी किया, वह इस पूरी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस बयान में साफ कहा गया है कि दोनों देशों ने अगले 60 दिनों के भीतर एक अंतिम और स्थायी समझौते पर पहुंचने का रोडमैप तैयार कर लिया है। इसका मतलब यह हुआ कि अगले दो महीने दुनिया के लिए बहुत नाजुक होने वाले हैं। दोनों देशों के बीच तकनीकी स्तर की बातचीत इस पूरे हफ्ते स्विट्जरलैंड में ही जारी रहेगी।

इस जॉइंट स्टेटमेंट की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि विवादों को सुलझाने और पूरी बातचीत की निगरानी करने के लिए चार खास कमेटियां बनाने पर सहमति बनी है। इन कमेटियों का काम केवल बातें करना नहीं होगा। इन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें से एक हाई-लेवल कमेटी होगी जो पूरे मामले पर राजनीतिक नजर रखेगी। इसके अलावा बाकी कमेटियां ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने और दोनों देशों के बीच पैदा होने वाले नए विवादों को तुरंत सुलझाने का काम करेंगी।

होर्मुज जलडमरूमध्य और तेल का खेल

इस पूरी बातचीत का जो सबसे बड़ा आर्थिक पहलू है, वह है होर्मुज जलडमरूमध्य यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। ईरान ने हाल ही में इसे बंद करने की धमकी दी थी, जिससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। अमेरिका में इस समय महंगाई और पेट्रोल-डीजल के दाम एक बड़ा चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं, जिससे ट्रंप की लोकप्रियता पर भी असर पड़ रहा था। यही वजह है कि अमेरिकी प्रशासन इस मुद्दे को सुलझाने के लिए इतना उतावला दिखा।

साझा बयान के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच एक सीधी संचार लाइन यानी कम्युनिकेशन लाइन स्थापित की गई है। इसका सीधा मकसद यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिल सके और किसी भी तरह की गलतफहमी या सैन्य झड़प से बचा जा सके। ईरान ने पिछले कुछ दिनों में ही करीब 3.6 करोड़ बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया है, जो यह दिखाता है कि प्रतिबंधों में ढील मिलते ही वह कितनी तेजी से बाजार में वापस लौट रहा है।

लेबनान और इजरायल का संकट कैसे सुलझेगा

इस बातचीत में केवल अमेरिका और ईरान का ही फायदा-नुकसान शामिल नहीं है। इसमें लेबनान का संकट भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। जॉइंट स्टेटमेंट में एक बेहद खास बात कही गई है। दोनों पक्ष एक डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल यानी सैन्य टकराव रोकने वाली इकाई बनाने पर सहमत हुए हैं। इस सेल में लेबनान की सरकार को भी शामिल किया जाएगा और कतर-पाकिस्तान इसके मध्यस्थ होंगे। इसका सीधा काम यह सुनिश्चित करना होगा कि लेबनान में चल रही सैन्य कार्रवाइयां और हिजबुल्लाह व इजरायल के बीच की जंग पूरी तरह से रुक सके।

हैरानी की बात यह है कि इजरायल इस पूरे समझौते का हिस्सा नहीं है और उसने इस बातचीत की कड़ी निंदा की है। इसके बावजूद ईरान और अमेरिका का इस मुद्दे पर आगे बढ़ना यह दिखाता है कि दोनों महाशक्तियां अब इस अंतहीन युद्ध से थक चुकी हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खुद सोशल मीडिया पर आकर इस बात की पुष्टि की कि मध्यस्थों के प्रयास से लेबनान युद्ध को रोकने की दिशा में बहुत बड़ी प्रगति हुई है।

पर्दे के पीछे की वो बातें जिन्हें छिपाया जा रहा है

कूटनीति में जो दिखता है, अक्सर सच उससे थोड़ा अलग होता है। रविवार की रात बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में माहौल इतना भी शांत नहीं था जितना साझा बयान में बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, रविवार की शाम को एक समय ऐसा आया था जब ईरानी प्रतिनिधिमंडल बातचीत छोड़कर बाहर जाने वाला था। इसकी वजह वाशिंगटन से आया राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान था जिसमें उन्होंने धमकी दी थी कि अगर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत नहीं खोला तो अमेरिका उस पर दोबारा भयानक हमले शुरू कर देगा।

ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने भी इसका कड़ा जवाब देते हुए कहा था कि ईरान अमेरिका की ऐसी खोखली धमकियों से डरने वाला नहीं है और ट्रंप को अपने बयानों में सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि, कतर और पाकिस्तान के राजनयिकों ने बीच-बचाव किया और लगभग 18 घंटे की मैराथन माथापच्ची के बाद दोनों पक्षों को फिर से मेज पर बिठाया गया।

Don't miss: starter fluid spray lawn

ईरान को इस बातचीत से तुरंत क्या मिला

ईरान इस बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें मनवाने के लिए आया था और शुरुआती दौर में उसे बड़ी कामयाबी मिलती दिख रही है। ईरानी विदेश मंत्री के मुताबिक, अमेरिका के साथ हुए इस शुरुआती समझौते के बाद कई बड़े फैसले लागू होने जा रहे हैं।

  • ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगी अमेरिकी पाबंदियों को अस्थाई रूप से हटा दिया गया है।
  • कतर और दूसरे विदेशी बैंकों में फ्रीज पड़ी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को रिलीज करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
  • ईरान के बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने पर सहमति बनी है।
  • ईरान के भीतर युद्ध से तबाह हुए बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय विकास प्लान लॉन्च किया जा रहा है।

अमेरिकी वित्त मंत्रालय (यूएस ट्रेजरी) ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर लगे प्रतिबंधों को 60 दिनों के लिए हटाने का एक अस्थाई आदेश जारी करने की तैयारी में है। इसके बदले में ईरान इस बात की गारंटी देगा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार बिना किसी बाधा के चलता रहेगा।

क्या वाकई यह शांति का नया दौर है या सिर्फ एक छलावा

इस पूरी बातचीत को लेकर दुनिया भर के विशेषज्ञ दो गुटों में बंट गए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की सीधी और व्यावहारिक कूटनीति काम कर रही है। वे जंग की जगह समझौते को तरजीह दे रहे हैं। वहीं, एक दूसरा धड़ा भी है जो इस पूरी प्रक्रिया को बेहद खतरनाक मान रहा है।

इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना यह हो रही है कि इसमें ईरान की आम जनता के मानवाधिकारों और उनकी लोकतांत्रिक मांगों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। पिछले हफ्ते दोनों देशों के बीच जो शुरुआती समझौता पत्र (एमओयू) साइन हुआ था, उसकी एक धारा में साफ लिखा है कि दोनों देश एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में बिल्कुल भी दखल नहीं देंगे। इसका मतलब यह हुआ कि ईरान की सरकार अपने देश के भीतर प्रदर्शनकारियों और विपक्ष के साथ जो चाहे करे, अमेरिका अब उस पर आंखें मूंद लेगा। आलोचकों का कहना है कि यह समझौता ईरान के उन आम लोगों के साथ धोखा है जो लंबे समय से आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में क्या देखना महत्वपूर्ण होगा

स्विट्जरलैंड में पहले दौर की बातचीत खत्म हो चुकी है लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। अगर आप इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखना चाहते हैं, तो आपको आने वाले दिनों में इन तीन चीजों पर खास ध्यान देना चाहिए।

सबसे पहले यह देखना होगा कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय प्रतिबंध हटाने का आधिकारिक आदेश कब जारी करता है और क्या अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में ट्रंप के इस कदम का विरोध होता है। दूसरा बड़ा संकेत कच्चे तेल के बाजार से मिलेगा। अगर तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आती है, तो समझ लीजिए कि होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट वाकई टल गया है। सबसे आखिरी और महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इजरायल इस पूरे घटनाक्रम पर क्या प्रतिक्रिया देता है। इजरायल लगातार इस समझौते का विरोध कर रहा है, ऐसे में लेबनान और सीरिया की धरती पर उसकी सैन्य गतिविधियां इस पूरे शांति समझौते को किसी भी समय पटरी से उतार सकती हैं।

कतर और पाकिस्तान ने फिलहाल एक बड़े युद्ध के खतरे को टाल दिया है। दोनों देशों की कूटनीति ने साबित कर दिया है कि जब बड़ी महाशक्तियां आपस में टकराने लगती हैं, तो छोटे और क्षेत्रीय देशों की भूमिका कितनी अहम हो जाती है। बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट से शुरू हुआ यह सफर अगले 60 दिनों में किसी स्थाई शांति समझौते में बदलता है या फिर दोनों देश दोबारा पुरानी दुश्मनी पर लौट आते हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।

WR

Wei Ramirez

Wei Ramirez excels at making complicated information accessible, turning dense research into clear narratives that engage diverse audiences.